लालन तन नैनन भरि चितई - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (21)

लालन तन नैनन भरि चितई - श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (21)

लालन तन नैनन भरि चितई।
मुरझि परयौ सुधि देह बिसारी, अनी दृग हियेरे परै गई॥ [1]
अधर फुरक श्री राधा गुन गाबत, कबहू कहाय कही।
वंशी अलि स्वामिन अति कोमल, हियरे लाय लई॥ [2]

- श्री वंशी अलि, माधुर्य शत (21)

श्री कृष्ण (लाल) ने प्रिया जी के श्रीअंगों को नेत्र भरकर निहारा। उस रूप माधुरी को देखकर वे मूर्छित होकर गिर पड़े और अपनी देह की सुधि भुला दी; ऐसा प्रतीत हुआ मानो श्री राधा के कटाक्षों की नोक उनके हृदय के पार हो गई हो। [1] 

मूर्छा की स्थिति में भी उनके अधर फड़क रहे हैं और वे श्री राधा के गुणों का गान कर रहे हैं, मुख से कुछ अनकहे शब्द निकल रहे हैं। श्री वंशी अलि कहते हैं कि तब स्वामिनी श्री राधा ने अत्यंत कोमलता से लालजी को हृदय से लगा लिया। [2]