रस लोभी दम्पति महा, अधिक एक ते एक।
न्यारे होत न निमिषहू, यही दोउन हिय टेक॥
- श्री सरस माधुरी
यह दिव्य दम्पति (श्री राधा-कृष्ण) रसास्वादन के अत्यंत लोभी हैं, और रस की उस प्यास में दोनों एक-दूसरे से बढ़कर हैं। उनके हृदय का यही एक दृढ़ संकल्प है कि वे एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते।
न्यारे होत न निमिषहू, यही दोउन हिय टेक॥
- श्री सरस माधुरी
यह दिव्य दम्पति (श्री राधा-कृष्ण) रसास्वादन के अत्यंत लोभी हैं, और रस की उस प्यास में दोनों एक-दूसरे से बढ़कर हैं। उनके हृदय का यही एक दृढ़ संकल्प है कि वे एक पल के लिए भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते।

