हरि हरि जप लेनी औसर बीतो जाय - श्री सहजोबाई

हरि हरि जप लेनी औसर बीतो जाय - श्री सहजोबाई

(राग काफ़ी)
हरि हरि जप लेनी औसर बीतो जाय।
जो दिन गये सो फिर नहिं आवैं, करि विचार मन लाय॥ [1]
या जग बाजी साँच न जानो, तामें मत भरमाय।
कोई किसी का है नहिं बौरे, नाहक लियौ लगाय॥ [2]
अंत समय कोई काम न आवैं, जब जम देहि बोलाय।
चरणदास कहैं ‘सहजो बाई’, सत संगत सरनाय॥ [3]

- श्री सहजोबाई

सहजोबाई कहती हैं कि हे मूर्ख! समय बीतता जा रहा है, इसलिए अवसर रहते 'हरि-हरि' नाम का जप कर लो। अपने मन को एकाग्र कर इस बात पर विचार करो कि जो दिन एक बार बीत गए, वे फिर कभी लौटकर नहीं आएंगे। [1]

इस संसार को एक खेल मात्र समझो, इसे सत्य मानकर इसमें भ्रमित मत हो। हे बावरे मन! यहाँ वास्तव में कोई किसी का नहीं है; तू व्यर्थ ही मोह में क्यों जीवन व्यतीत कर रहा है? [2]

जब मृत्यु (यमराज) का बुलावा आएगा, तब अंत समय में कोई भी सांसारिक संबंधी काम नहीं आएगा। संत चरणदास जी की शिष्या सहजोबाई कहती हैं कि केवल संत की संगति (सत्संग) और प्रभु की शरण ही कल्याणकारी है। [3]