यत्रैवातिरसोन्मदं विहरते मत्प्रेष्ठवस्तुद्वयं - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.99)

यत्रैवातिरसोन्मदं विहरते मत्प्रेष्ठवस्तुद्वयं - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.99)

यत्रैवातिरसोन्मदं विहरते मत्प्रेष्ठवस्तुद्वयं भक्तिः क्वापि महारसोत्सवमयी यत्रैव निःस्यन्दते।
यत्रैव प्रविशन्ति नैव निगमश्रेणीगिरां भंगय-स्तस्मिन्नेव ममास्तु धीः प्रणयिनी वृन्दावने पावने॥

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.99)

जहाँ अत्यन्त प्रेमरस में मग्न होकर मेरे प्रियतम युगल (राधा-कृष्ण) नित्य विहार करते हैं, जहाँ भक्ति महारसमय उत्सव की तरह निरन्तर प्रवाहित हो रही है, जहाँ वेद उपनिषत् की गूढ़ वाणियाँ प्रवेश नहीं प्राप्त कर सकतीं, उसी पावन श्रीवृन्दावन में मेरी बुद्धि प्रेमपूर्वक सदा लगी रहे।