साँचौ निहचै प्रेम कौ जीवन मुक्ति रसाल - श्री सूरदास, सूर सागर (4713.26)

साँचौ निहचै प्रेम कौ जीवन मुक्ति रसाल - श्री सूरदास, सूर सागर (4713.26)

साँचौ निहचै प्रेम कौ, जीवन मुक्ति रसाल।
एकै निहचै प्रेम कौ, जबै मिलें गोपाल॥

- श्री सूरदास, सूर सागर (4713.26)

उद्धव द्वारा प्रतिपादित योग के प्रत्युत्तर में ब्रज-गोपिकाएँ प्रेम-तत्व की सर्वोच्चता सिद्ध करते हुए कहती हैं— प्रेम का सच्चा निश्चय ही जीवन की सरस मुक्ति है और जब जीवन में श्री गोपाल के प्रति प्रेम दृढ़ हो जाता है, तो वे अवश्य मिल जाते हैं।