दोऊ जन क्रीडत हैं बन माँहि -  श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (720)

दोऊ जन क्रीडत हैं बन माँहि - श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (720)

(राग मल्हार)
दोऊ जन क्रीडत हैं बन माँहि।
उमडि घटा घुमडी चहुँ दिसितैं,
देखत उर न समाँहि॥ [1]
देखि घटा धावत कुंजनि कौं,
बिच ही बूंदनि आँहि।
"कृष्णदास" गहि ओट कदम्ब की,
भींजत क्यों न सुहाँहि॥ [2]

- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (720)

युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) वृन्दावन में क्रीड़ा कर रहे हैं। चारों दिशाओं से उमड़ते-घुमड़ते हुए काले बादलों को देखकर उनके हृदय में आनंद समा नहीं रहा है। [1]

घटाओं को देखकर वे निकुंजों की ओर दौड़ रहे हैं, किन्तु मार्ग के बीच में ही वर्षा की बूंदें गिरने लगी हैं। श्री कृष्णदास कहते हैं कि अब वे दोनों कदम्ब के वृक्ष की ओट लेकर खड़े हो गए हैं, उस वर्षा में भीगते हुए वे दोनों अत्यंत सुहावने और मनमोहक लग रहे हैं। [2]