अग्र भजन आतुर करो जौ लौं पंजर श्वास - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

अग्र भजन आतुर करो जौ लौं पंजर श्वास - श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

'अग्र' भजन आतुर करो, जौ लौं पंजर श्वास।
नदी किनारे रूखरा, जब कब होय विनास॥

- श्री अग्रदास जी, अग्रग्रंथावली

श्रीअग्रस्वामी जी सचेत करते हुए कहते हैं कि जैसे नदी किनारे पर लगा हुआ वृक्ष नदी के प्रवाह से कभी भी नष्ट हो सकता है, उसी प्रकार यह जीवन अत्यंत अनिश्चित है। जब तक देह में प्राण हैं तब तक शीघ्रतापूर्वक प्रभु का भजन करके अपने जन्मों की बिगड़ी बात बना लेनी चाहिए। अन्यथा शरीर रूपी पिंजरे से यदि यह जीवात्मा रूपी पक्षी चला गया, तब वह पिंजरा (शरीर) किस काम का रह जाएगा।