बैठत केवल उठत केवल - श्री सुंदरदास जी

बैठत केवल उठत केवल - श्री सुंदरदास जी

(सवैया)
बैठत केवल उठत केवल बोलत केवल बात कही है।
जागत केवल सोवत केवल जोवत केवल दृष्टि लही है॥ [1]
भूत है केवल भय हू केवल बर्तत केवल ब्रह्म सही है।
है सब ही अध ऊरध केवल ‘सुंदर’ केवल ज्ञान वही है॥ [2]

- श्री सुंदरदास जी

बैठना, उठना और सम्भाषण—सब कुछ उस ब्रह्म का ही रूप है। जाग्रत अवस्था हो या निद्रा, अथवा जगत में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है, उन समस्त प्रपंचों में केवल उस एक ही परमात्म-तत्व का दर्शन करना ही वास्तविक सम्यक-दृष्टि है। [1]

जो काल व्यतीत हो चुका है वह भी ब्रह्म था, जो अज्ञात भय के रूप में भासित होता है वह भी वही है, और वर्तमान में जो कुछ भी प्रत्यक्ष घटित हो रहा है, वह साक्षात् सत्यस्वरूप ब्रह्म ही है। श्री सुंदरदास जी कहते हैं कि ऊपर, नीचे और दसों दिशाओं में एकमात्र वही अविनाशी परमात्मा व्याप्त है; इस सर्वात्म-भाव का अनुभव ही यथार्थ ज्ञान है। [2]