पिता सुत बंधु कहा सम्बंध - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (35)

पिता सुत बंधु कहा सम्बंध - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (35)

(सवैया)
पिता-सुत-बंधु कहा सम्बंध, सबै जग अंध न गंध सुहातौ। [1]
कहा बसें गाउँ कहा लिये नाउँ, लहै नहि ठांउँ फिरै बिलखातौ॥ [2]
श्रीबिहारिनिदासि सुहाग बिना जु, सिंगार कौं भारु छिया करि हांतौ। [3] 
लालच गोद लियो सुत सौति को, प्रेम बिना न विराजत नातौ॥ [4]

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (35)

हे भाई! यह सर्वथा अकाट्य सिद्धांत है कि इहलोक-परलोक दोनों में ही प्रेम के बिना कोई नाता नहीं हुआ करता। इस संसार में माता, पिता, पुत्र और भ्राता आदि के जितने भी नाते हैं, वे मूलतः स्वार्थ की नींव पर टिके हैं। यहाँ वास्तविक निस्वार्थ प्रेम की सुगंध तक नहीं है, इसलिए केवल अज्ञानी लोग ही इन संबंधों में उलझते हैं। [1]

प्रेम विहीन व्यक्ति चाहे धाम में आकर बसे, चाहे दिन-रात निरंतर नाम रटा करे, उसे प्रियतम के दिव्य प्रेम-साम्राज्य में लेशमात्र भी स्थान प्राप्त नहीं हो सकता। [2]

जैसे किसी विवाहिता स्त्री का पति के अभाव में किया गया समस्त श्रृंगार निष्प्रयोजन है; वह सौंदर्य-साधन उसे सुख देने के बजाय एक बोझ की भांति प्रतीत होता है। [3]

जैसे कोई स्त्री लालचवश अपनी सौत के पुत्र को गोद में भर ले, तब भी वह बालक उसका अपना आत्मज नहीं बन सकता, वैसे ही बिना निस्वार्थ प्रेम के किसी भी साधना या संबंध की कोई गरिमा नहीं होती। वस्तुतः सच्चा प्रेम ही समस्त साधनों का सार है इसके बिना जप, तप, उपवास आदि सब व्यर्थ का श्रम मात्र है। [4]