राधे त्वद्दास्य पदवी सर्व भक्तश्च दुर्गमा।
तत्रापि वन्निर्लजो दुःप्रत्याशां करोम्यहम्॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (66)
हे राधे! यद्यपि आपकी दास्य-पदवी समस्त भक्तों के लिये भी अत्यन्त दुर्गम है, तथापि मैं निर्लज्ज की भाँति केवल उसी दुर्लभ पद को प्राप्त करने की आशा हृदय में संजोए बैठी हूँ।
तत्रापि वन्निर्लजो दुःप्रत्याशां करोम्यहम्॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (66)
हे राधे! यद्यपि आपकी दास्य-पदवी समस्त भक्तों के लिये भी अत्यन्त दुर्गम है, तथापि मैं निर्लज्ज की भाँति केवल उसी दुर्लभ पद को प्राप्त करने की आशा हृदय में संजोए बैठी हूँ।

