श्री राधा हौं जानति तो मन की।
प्रीतम बिनय सुनत हिय लरजति, पोषन साँचे पन की ॥ [1]
मूरति बिपुल सनेह लड़ैती, पालक सहचरि गन की।
करुना कुसल छबीली भामिनि, स्वामिनि ‘वृन्दावन’ की॥ [2]
- श्री वृंदावन दास चाचा जी
(एक सखी कहती है) हे श्री राधा! मैं आपके मन की बात भली-भाँति जानती हूँ। अपने प्रियतम (श्री कृष्ण) के विनय भरे वचन सुनकर आपका हृदय द्रवित हो जाता है क्योंकि आप अपने प्रेम के सच्चे प्रण का पोषण करने वाली हैं। [1]
हे लाड़ली जी! आप अगाध स्नेह की साक्षात् मूर्ति हैं और अपनी समस्त सहचरियों का पोषण करने वाली हैं। हे परम छबीली भामिनी! आप कृपा बरसाने में परम शिरोमणि हैं तथा श्री वृन्दावन की एकमात्र स्वामिनी हैं। [2]
प्रीतम बिनय सुनत हिय लरजति, पोषन साँचे पन की ॥ [1]
मूरति बिपुल सनेह लड़ैती, पालक सहचरि गन की।
करुना कुसल छबीली भामिनि, स्वामिनि ‘वृन्दावन’ की॥ [2]
- श्री वृंदावन दास चाचा जी
(एक सखी कहती है) हे श्री राधा! मैं आपके मन की बात भली-भाँति जानती हूँ। अपने प्रियतम (श्री कृष्ण) के विनय भरे वचन सुनकर आपका हृदय द्रवित हो जाता है क्योंकि आप अपने प्रेम के सच्चे प्रण का पोषण करने वाली हैं। [1]
हे लाड़ली जी! आप अगाध स्नेह की साक्षात् मूर्ति हैं और अपनी समस्त सहचरियों का पोषण करने वाली हैं। हे परम छबीली भामिनी! आप कृपा बरसाने में परम शिरोमणि हैं तथा श्री वृन्दावन की एकमात्र स्वामिनी हैं। [2]

