प्रिया-बदन-बिधु तन लखे, पिय के नैन-चकोर।
रूप-रसासव-पान करि, छकि रहे नंदकिसोर॥
- श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (68)
श्री प्रिया जी के मुख-रूपी चंद्रमा की ओर प्रियतम श्री कृष्ण के नेत्र चकोर के समान निरंतर एकटक निहारते रहते हैं। श्री राधा के अगाध सौंदर्य-रूपी मदिरा का निरंतर पान करके नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सदा छके रहते हैं।
रूप-रसासव-पान करि, छकि रहे नंदकिसोर॥
- श्री ब्रजनिधि जी, ब्रजनिधि ग्रंथावली, प्रीति लता (68)
श्री प्रिया जी के मुख-रूपी चंद्रमा की ओर प्रियतम श्री कृष्ण के नेत्र चकोर के समान निरंतर एकटक निहारते रहते हैं। श्री राधा के अगाध सौंदर्य-रूपी मदिरा का निरंतर पान करके नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सदा छके रहते हैं।

