भाव अनोखी वस्तु है, जो कर जाने कोय।
“रूपमाधुरी” भाव से, दुख सुख सबही होय॥
- श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, भाव महिमा अंग (5)
‘भाव’ अर्थात आंतरिक भावना एक विलक्षण तत्व है, जिसका वास्तविक मर्म कोई विरला व्यक्ति ही अनुभूति द्वारा जान पाता है। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि संसार में अनुभव होने वाले सुख और दुःख का मूल कारण मनुष्य के अपने भाव ही हैं।
“रूपमाधुरी” भाव से, दुख सुख सबही होय॥
- श्री रूप माधुरी, श्री रूप माधुरी जी की वाणी, भाव महिमा अंग (5)
‘भाव’ अर्थात आंतरिक भावना एक विलक्षण तत्व है, जिसका वास्तविक मर्म कोई विरला व्यक्ति ही अनुभूति द्वारा जान पाता है। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि संसार में अनुभव होने वाले सुख और दुःख का मूल कारण मनुष्य के अपने भाव ही हैं।

