(राग विभास)
रुनकि-झुनकि आवति कुंजनि तैं, ठटकि-ठटकि पद धरति नवेली । [1]
झुकि-झुकि चलत सघन बीथिन पिय, निरुवारत कल कुसुमन बेली॥[2]
लटकि-लटकि नव नीलाम्बर बर, जाति सँमारति संग सहेली। [3]
पीक कपोल लोल दृग राते, रमि रहि नैननि छवि अलबेली॥ [4]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (82)
नवल किशोरी (श्री राधा) कुंजों से अपने पायलों की रुनझुन ध्वनि करती हुई आ रही हैं और धीरे-धीरे अपने पग धर रही हैं। [1]
सघन गलियों में चलते हुए प्रियतम (श्री कृष्ण) झुक-झुक कर उनके मार्ग में आने वाली सुंदर पुष्प-लताओं को हटा रहे हैं जिससे प्रिया जी को चलने में कोई बाधा न हो। [2]
चलते समय उनका सुंदर नीला वस्त्र (नीलाम्बर) बार-बार लटक जाता है, जिसे उनकी सहचरियाँ बड़े प्रेम से सँभालती हुई जा रही हैं। [3]
उनके कपोलों पर पान की पीक सुशोभित है, चंचल नेत्र रस मगन हैं, उनकी यह अनुपम छवि श्री अलबेली अलि जी के नयनों में सदा के लिए बस गई है। [4]
रुनकि-झुनकि आवति कुंजनि तैं, ठटकि-ठटकि पद धरति नवेली । [1]
झुकि-झुकि चलत सघन बीथिन पिय, निरुवारत कल कुसुमन बेली॥[2]
लटकि-लटकि नव नीलाम्बर बर, जाति सँमारति संग सहेली। [3]
पीक कपोल लोल दृग राते, रमि रहि नैननि छवि अलबेली॥ [4]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (82)
नवल किशोरी (श्री राधा) कुंजों से अपने पायलों की रुनझुन ध्वनि करती हुई आ रही हैं और धीरे-धीरे अपने पग धर रही हैं। [1]
सघन गलियों में चलते हुए प्रियतम (श्री कृष्ण) झुक-झुक कर उनके मार्ग में आने वाली सुंदर पुष्प-लताओं को हटा रहे हैं जिससे प्रिया जी को चलने में कोई बाधा न हो। [2]
चलते समय उनका सुंदर नीला वस्त्र (नीलाम्बर) बार-बार लटक जाता है, जिसे उनकी सहचरियाँ बड़े प्रेम से सँभालती हुई जा रही हैं। [3]
उनके कपोलों पर पान की पीक सुशोभित है, चंचल नेत्र रस मगन हैं, उनकी यह अनुपम छवि श्री अलबेली अलि जी के नयनों में सदा के लिए बस गई है। [4]

