आरति करत नवल सुकुमारी॥
करि श्रृंगार मुखमुकुर विलोकत विहँसत प्रीतम प्यारी।
रंग तमोल सरस द्युति मुसकन अली निरख बलिहारी॥ [1]
करत पानरस रूपमाधुरी चहूं ओर सहचारी।
रामसखी दोउन कर मंडल दै चटकावत अंगुरीवर नारी॥ [2]
- श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
सखियाँ युगल की आरती कर रही हैं। युगल को पूर्ण श्रृंगार धारण कर जब वे दर्पण में उनका मुख उन्हें दिखाती हैं, तब प्रियतम और प्यारी परस्पर मंद-मंद मुस्कुराने लगते हैं। उनके अधरों पर पान की लाली और मुस्कान की मधुर आभा को देखकर सखियाँ उन पर बलिहारी जा रही हैं। [1]
चारों ओर खड़ी सहचरियाँ रूप-माधुरी और प्रेम-रस के आस्वादन में डूबी हैं। श्री रामसखी कहती हैं कि सखियाँ दोनों के चारों ओर हाथों का मण्डल बनाकर अपनी अंगुलियाँ चटकाते हुए युगल की आरती उतार रही हैं। [2]
करि श्रृंगार मुखमुकुर विलोकत विहँसत प्रीतम प्यारी।
रंग तमोल सरस द्युति मुसकन अली निरख बलिहारी॥ [1]
करत पानरस रूपमाधुरी चहूं ओर सहचारी।
रामसखी दोउन कर मंडल दै चटकावत अंगुरीवर नारी॥ [2]
- श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
सखियाँ युगल की आरती कर रही हैं। युगल को पूर्ण श्रृंगार धारण कर जब वे दर्पण में उनका मुख उन्हें दिखाती हैं, तब प्रियतम और प्यारी परस्पर मंद-मंद मुस्कुराने लगते हैं। उनके अधरों पर पान की लाली और मुस्कान की मधुर आभा को देखकर सखियाँ उन पर बलिहारी जा रही हैं। [1]
चारों ओर खड़ी सहचरियाँ रूप-माधुरी और प्रेम-रस के आस्वादन में डूबी हैं। श्री रामसखी कहती हैं कि सखियाँ दोनों के चारों ओर हाथों का मण्डल बनाकर अपनी अंगुलियाँ चटकाते हुए युगल की आरती उतार रही हैं। [2]

