मित्र कलत्र सुबन्धु सुतइ नमें सहज सनेह - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (20)

मित्र कलत्र सुबन्धु सुतइ नमें सहज सनेह - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (20)

मित्र कलत्र सुबन्धु सुत, इनमें सहज सनेह।
सुद्ध प्रेम इनमें नहीं, अकथ कथा सबिसेह॥

- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (20)

यद्यपि संसार में मित्र, पत्नी, भ्राता और पुत्र आदि संबंधों में स्वाभाविक अनुराग दृष्टिगोचर होता है, तथापि इसे 'विशुद्ध प्रेम' की संज्ञा नहीं दी जा सकती। वास्तव में शुद्ध प्रेम की महिमा विलक्षण और वर्णनातीत है, जो निष्काम भाव से केवल प्रेमी को सुख देने के लिए ही किया जाता है।