करुणा करि वन वास दीजिए - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (08)

करुणा करि वन वास दीजिए - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (08)

(राग देश वा जिला)
करुणा करि वन वास दीजिए क्यों मम सुरति विसारी।
टहल महल तें छेंक दई हा कौन चूक चित्त धारी॥ [1]
यद्यपि मेटि मेंड निगमागम मैं सब भाँति बिगारी।
ललित लड़ैती तनमन अकुलित दुख नहिं जात सहारी॥ [2]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (08)

हे स्वामिनी! कृपा करके मुझे अपने निज धाम श्री वृन्दावन का वास प्रदान कीजिये। हे करुणामयी! क्या कारण है कि आपने मुझे अपनी स्मृति से विस्मृत कर दिया है? हा राधे! आपने मुझे अपने महल की टहल (सेवा) से क्यों वंचित कर दिया? मुझसे ऐसा कौन सा अपराध बन पड़ा है जिसे आपने अपने हृदय में धारण कर लिया है? [1]

यद्यपि मैंने वेदों की मर्यादा और शास्त्रों के विधानों का पूर्णतः उल्लंघन किया है और इस संसार में सबसे अपना सम्बन्ध बिगाड़ लिया है, तथापि हे लाड़ली राधे! अब आपके विरह की अग्नि में मेरा तन और मन अत्यंत व्याकुल हो रहे हैं। अब यह वियोग का असह्य दुःख मुझसे सहन नहीं होता। [2]