ज्यों ज्यों निरखत राधिका, अनियारे दृग तान।
त्त्यों त्यों निकरत साँवरे, रूप रतन की खान॥
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (08)
जैसे-जैसे श्री राधा महारानी जू अपने तीखे और कजरारे नेत्रों की कमान तानकर प्रियतम की ओर निहारती हैं, वैसे-वैसे श्यामसुंदर का माधुर्य और भी अधिक निखर कर सामने आता है।
त्त्यों त्यों निकरत साँवरे, रूप रतन की खान॥
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, श्याम शतक (08)
जैसे-जैसे श्री राधा महारानी जू अपने तीखे और कजरारे नेत्रों की कमान तानकर प्रियतम की ओर निहारती हैं, वैसे-वैसे श्यामसुंदर का माधुर्य और भी अधिक निखर कर सामने आता है।

