यह माँगों गोपी-जन-बल्लभ - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1350)

यह माँगों गोपी-जन-बल्लभ - श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1350)

(राग कान्हरौ)
यह माँगों गोपी-जन-बल्लभ।
मानुस-जनम और हरि-सेवा, ब्रज-बसिबौ दीजै मोहि सुल्लभ॥ [1]
श्रीबल्लभ-कुल कौ हौं चेरौ, बैष्णवजन कौ दास कहाऊँ।
श्रीजमुना-जल नित-प्रति न्हाऊँ, मन-बच-कर्म कृष्ण-गुन गाऊँ॥ [2]
श्रीमद्भागवत स्रवन सुनौ नित, इन तजि चित कहुँ अनत न लाऊँ।
'परमानंद' इहि माँगत नित-नित, निरखौं हौं कबहूँ न अघाऊँ॥ [3]

- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1350)

हे गोपीजनवल्लभ (श्री कृष्ण)! मैं आपसे बस यही वरदान माँगता हूँ की जब जब भी मुझे मनुष्य जन्म प्राप्त हो, श्री हरि की सेवा मिले और श्री ब्रजधाम का ही वास प्राप्त हो। [1] 

मैं सदैव श्री वल्लभ-कुल (महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी के कुल) का दास बना रहूँ और वैष्णवों का किंकर कहलाऊँ। मैं नित्य श्री यमुना जी के जल में स्नान करूँ और मन, वचन तथा कर्म से केवल श्री कृष्ण के गुणों का ही गान करूँ। [2] 

मैं प्रतिदिन श्रीमद्भागवत का श्रवण करूँ और इसके अतिरिक्त अपने चित्त को कहीं अन्यत्र न लगाऊँ। श्री परमानंद दास कहते हैं कि मैं नित्य यही माँगता हूँ कि मैं आपके सुंदर छवि को निरंतर निहारता रहूँ और कभी तृप्त न होऊँ। [3]