वह कंज सो कोमल - श्री ठाकुर जी

वह कंज सो कोमल - श्री ठाकुर जी

(सवैया)
वह कंज सो कोमल, अंग गुपाल को, सोऊ सबै पुनि जानति हौ।
बलि नेक रुखाई धरे कुम्हलात, इतौऊ नहीं पहिचानति हौ॥ [1]
कवि 'ठाकुर’ या कर जोरि कह्यो, इतने पै मनै नहिं मानति हौ।
दृग बान ये भौंह कमान कहौ, अब कान लौं कौन पै तानति हौ॥ [2]

- श्री ठाकुर जी

एक सखी श्री राधा से परिहास अथवा मनुहार करते हुए कहती है— हे सखी! तुम यह भली-भांति जानती हो कि गोपाल (श्री कृष्ण) के अंग कमल के समान अत्यंत कोमल हैं। मैं तुम्हारे बलैया लेती हूँ, तुम इतना नहीं पहचानती कि तुम्हारी केवल तनिक सी बेरुखी (मान) से श्री कृष्ण मुरझा जाते हैं? [1] 

कवि ठाकुर कहते हैं कि सखी हाथ जोड़कर प्रार्थना करती है कि इतना सब जानने पर भी तुम्हारा मन नहीं मान रहा है। अब तुम ही कहो, अपने इन कजरारे नेत्र रूपी बाणों को भौंहों रूपी कमान पर चढ़ाकर, किस पर तानने की तैयारी कर रही हो? अर्थात तुम्हारी तिरछी चितवन के प्रहार से तो वे कोमल श्यामसुंदर पूर्ण रूप से घायल ही हो जाएंगे। [2]