मोहिं मनमोहन मनभाय रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (80)

मोहिं मनमोहन मनभाय रे - श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (80)

मोहिं मनमोहन मनभाय रे।
कोउ कर जप कोउ तप कोउ व्रत कोउ, विपिन समाधि लगाय रे॥ [1]
कोउ कर तीरथ चारि धाम कोउ, मरने काशी जाय रे।
कोउ पट गेरुआ कोउ केशरिया, रँग अनेक रँगाय रे॥ [2]
कोउ बिंदी, कोउ खड़ा तिलक कोउ, भस्म ललाट लगाय रे।
काम 'कृपालु' तबै बनिहुँ जब, हरि चरनन मन लाय रे॥ [3]

- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (80)

मुझे तो केवल वे मन को मोहने वाले प्राणप्रिय मनमोहन (श्री कृष्ण) ही मनभावन लगते हैं। कोई जप करता है, कोई तप करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई जंगल में जाकर समाधि लगाता है। [1]

कोई चारों धामों की तीर्थ-यात्रा करता है, तो कोई मुक्ति की चाह में मरने के लिए काशी जाता है। कोई गेरुए वस्त्र धारण करता है, तो कोई केसरिया; इस प्रकार लोग अपने वस्त्रों को अनेक रंगों में रँगाते हैं। [2]

कोई मस्तक पर बिंदी लगाता है, कोई खड़ा तिलक लगाता है, तो कोई अपने ललाट पर भस्म रमाता है। श्री कृपालु जी कहते हैं कि जीव का वास्तविक कार्य (कल्याण) तो तभी सिद्ध होगा, जब वह इन बाह्य क्रियाओं से ऊपर उठकर अपने मन को पूर्ण रूप से श्री हरि के चरणों में लगाएगा। [3]