एक राधा ब्रज में बसै - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (714-716)

एक राधा ब्रज में बसै - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (714-716)

एक राधा ब्रज में बसै, एक राधा रास विलास ।
तीजी राधा कुंज में, दुलरावें हरिदास ॥ [1]
राधा नाम विभाग करि, समुझो रसिक सुजान ।
जनम करम जाको नहीं, एक रस वेस समान ॥ [2]
भावे तो राधा कहौ, भावे कुंजबिहारिनि नाम ।
नाम वस्तु अभेद है, लीला भेद पर नाम ॥ [3]

- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (714-716)

एक राधा ब्रज में ब्रजेश्वरी स्वरूप से विराजमान हैं, एक राधा रास-लीला में रासेश्वरी स्वरूप से विलास करती हैं, और तीसरी राधा नित्य निकुंज-विहारिणी स्वरूप से निकुंजों में नित्य विहार करती हैं, जिन्हें रसिक-शिरोमणि स्वामी हरिदास जी लाड़ लड़ाते हैं। [1]

हे सुजान रसिकों! श्री राधा नाम के इस दिव्य रहस्य को गहराई से समझो। वास्तव में वे सदा अजन्मा हैं, जिनका कोई प्राकृत जन्म या कर्म नहीं है। वे सर्वदा एक ही रस और एक ही समान वेश (नित्य किशोरी रूप) में सुशोभित रहती हैं। [2]

चाहे तो उन्हें 'राधा' कहो, या 'कुंजबिहारिनि' नाम अथवा किसी अन्य नाम से पुकारो, यह तो भक्त की इच्छा पर निर्भर करता है, इसमें कोई भेद नहीं है। यद्यपि वस्तु रूप में नाम और नामी में कोई भेद नहीं है (दोनों सर्वथा अभिन्न हैं), तथापि केवल लीलाओं के भेद से ही उनके अलग-अलग नाम प्रसिद्ध हुए हैं। [3]