कोमल कमल हू सों गहरे गुलाबन सों - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (06)

कोमल कमल हू सों गहरे गुलाबन सों - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (06)

(कवित्त)
कोमल कमल हू सों गहरे गुलाबन सों,
ललित रसाल पत्र आभा के हरन हैं। [1]
लाल हैं गुलाल गुंज हिंगुर सिंदुर बिंब,
ये कहा बिचारे रंक समता करन हैं॥ [2]
'लाल बलबीर' उर करत बिचार चारु,
उपमा हजारन की सुषमा दरन हैं। [3]
रसिक जनन धन ये ही हैं अगिन सर्व,
आनंद करन राधारानी के चरन हैं॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (06)

श्री राधारानी के चरण कमल से भी अधिक सुकोमल  हैं, गहरे गुलाब के फूल की आभा से भी अधिक रक्तिम हैं। नकी लालिमा आम्र-पत्रों की कोमल आभा को भी फीका कर देती है। [1]

गुलाल, गुंजा, हिंगुल (शिंगरफ), सिंदूर और बिंबफल — ये बेचारे सभी इन श्रीचरणों के समक्ष अत्यंत दरिद्र लगते हैं, भला इन दिव्य लाल चरणों से समानता करने की सामर्थ्य इनमें कहाँ! [2]

श्री लाल बलबीर अपने हृदय में बारम्बार विचार करते हैं कि हजारों उपमाएँ भी उन चरणों की अद्भुत शोभा का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकतीं। [3]

समस्त रसिक जनों का सर्वस्व अथवा वास्तविक धन तो श्री राधारानी के चरण ही हैं, जो सम्यक प्रकार से आनंद प्रदान करने वाले हैं। [4]