इतनी कहि हिय विवस ह्वै रुदन कियौ ब्रजवाल - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (14)

इतनी कहि हिय विवस ह्वै रुदन कियौ ब्रजवाल - श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (14)

इतनी कहि हिय विवस ह्वै, रुदन कियौ ब्रजवाल।
मृदु मुसिकात प्रगट भईं, नवकिशोरि तिहिं काल॥

- श्री वंशी अलि, श्री राधिका महारास, दोहा (14)

श्री राधा और सखियों के महारास-विलास में, जब श्री राधा रानी सहसा अंतर्धान हो गईं, तब समस्त ब्रजवालाएँ उनके विरह में पूर्णतः भाव-विह्वल हो उठीं। इतना कहकर वे हृदय से विवश हो गईं और आर्त होकर रुदन करने लगीं। जैसे ही उन्होंने अश्रु-पूरित नेत्रों से अपनी प्राण-प्रिया श्री राधा को रो कर पुकारा, ठीक उसी क्षण, मुख-कमल पर मंद-मंद मुस्कान बिखेरती हुई श्री राधा जू वहाँ साक्षात् प्रकट हो गईं।