आजु सखी तोहिं लागी इहै रट - श्री चतुर्भुज दास

आजु सखी तोहिं लागी इहै रट - श्री चतुर्भुज दास

(राग गौरी)
आजु सखी तोहिं लागी इहै रट।
गोविंदलेहु लेहु कोउ गोविंद कहति फिरति बन में घट औघट॥ [1]
दधि कौ नांउ बिसरि गयो देखत स्याम सुंदर ओढे सुभग पीतपट।
माँगत दान ठगौरी मेली 'चत्रुभुज' प्रभु गिरिधर नागर नट॥ [2]

- श्री चतुर्भुज दास

एक सखी दूसरी सखी की प्रेम-विह्वलता को देखकर कहती है— 
हे सखी! आज तो तुझे बस यही एक रट लग गई है। तू वृन्दावन के सीधे-टेढ़े और दुर्गम वीथियों में भटकती हुई 'गोविन्द ले लो, कोई गोविन्द ले लो!' यही पुकारती फिर रही है। [1]

सुंदर पीताम्बर ओढ़े हुए श्यामसुंदर को देखते ही तू दही का नाम तक भूल गई (और दही बेचने के स्थान पर अपने प्रिय गोविन्द को ही बेचने की पुकार लगाने लगी)। श्री'चतुर्भुज दास कहते हैं कि मार्ग में दान माँगने वाले उन चतुर नटवर लाल श्री गिरिधरलाल ने अपनी मोहिनी छवि से तुझ पर ऐसा जादू डाल दिया है कि तू अपनी सुध-बुध खो बैठी है। [2]