(सवैया)
बड़े जोर की प्यास लगी उर में, अधरामृत आके पिलाओ सखे । [1]
जली देह वियोग के पावक में, घनश्याम सुधा वरसाओ सखे॥ [2]
उड़ने लगे प्राण पखेरू मेरे, अब और विलम्ब न लाओ सखे । [3]
अरे धाओ सखे अरे धाओ सखे अरे आओ सखे अरे आओ सखे॥ [4]
- श्री हरे कृष्ण जी
विरह-व्याकुल गोपी अपने प्राणप्रिय श्री कृष्ण को पुकारते हुए कह रही हैं—
हे सखा! मेरे हृदय में आपके मिलन की बड़े ज़ोर की प्यास जगी है, आप शीघ्र आकर मुझे अपने अधरों का दिव्य अमृत (अधरामृत) पिलाकर तृप्त कर दीजिए। [1]
मेरी यह देह वियोग की भीषण अग्नि में निरंतर जल रही है, हे घनश्याम! अब आप आकर स्वाति-नक्षत्र की बूँदों के समान अपनी प्रेमामृत की वर्षा कर दीजिए। [2]
आपके विरह में मेरे प्राण-पक्षी अब इस शरीर को छोड़कर उड़ने ही वाले हैं, इसलिए हे प्यारे सखा! अब आने में और अधिक देर मत लगाइए। [3]
अरे मेरे सखा! अब शीघ्र दौड़ो, अरे दौड़कर आओ सखा, अरे शीघ्र आओ, अरे यहाँ आओ! [4]
बड़े जोर की प्यास लगी उर में, अधरामृत आके पिलाओ सखे । [1]
जली देह वियोग के पावक में, घनश्याम सुधा वरसाओ सखे॥ [2]
उड़ने लगे प्राण पखेरू मेरे, अब और विलम्ब न लाओ सखे । [3]
अरे धाओ सखे अरे धाओ सखे अरे आओ सखे अरे आओ सखे॥ [4]
- श्री हरे कृष्ण जी
विरह-व्याकुल गोपी अपने प्राणप्रिय श्री कृष्ण को पुकारते हुए कह रही हैं—
हे सखा! मेरे हृदय में आपके मिलन की बड़े ज़ोर की प्यास जगी है, आप शीघ्र आकर मुझे अपने अधरों का दिव्य अमृत (अधरामृत) पिलाकर तृप्त कर दीजिए। [1]
मेरी यह देह वियोग की भीषण अग्नि में निरंतर जल रही है, हे घनश्याम! अब आप आकर स्वाति-नक्षत्र की बूँदों के समान अपनी प्रेमामृत की वर्षा कर दीजिए। [2]
आपके विरह में मेरे प्राण-पक्षी अब इस शरीर को छोड़कर उड़ने ही वाले हैं, इसलिए हे प्यारे सखा! अब आने में और अधिक देर मत लगाइए। [3]
अरे मेरे सखा! अब शीघ्र दौड़ो, अरे दौड़कर आओ सखा, अरे शीघ्र आओ, अरे यहाँ आओ! [4]

