नाथ अनाथनकी सब जानै - श्री युगल प्रिया

नाथ अनाथनकी सब जानै - श्री युगल प्रिया

(राग हमीर - ताल तिताला)
नाथ अनाथनकी सब जानै॥ [1]
ठाढ़ी द्वार पुकार करति हौं, श्रवण सुनत नहिं कहा रिसानै ।
की बहु खोट जानि जिय मेरी, की कछु स्वारथ हित अरगानै॥ [2]
दीनबंधु मनसाके दाता, गुन औगुन कैधों मन आनै।
आप एक हम पतित अनेकन, यही देखि का मन सकुचानै॥ [3]
झूठौं अपनो नाम धरायो, समझ रहे हैं हमहि सयानै।
तजो टेक मनमोहन मेरे, ‘जुगलप्रिया’ दीजै रस दानै॥ [4]

- श्री युगल प्रिया

हे नाथ! आप अनाथों और असहायों के हृदय की सब बातें भली-भांति जानते हैं। [1]

मैं कब से आपके द्वार पर खड़ी पुकार रही हूँ, पर आप अपने कानों से मेरी करुण पुकार सुन क्यों नहीं रहे? क्या आप मुझ पर किसी बात से रूठ गए हैं? या फिर मेरे हृदय के बहुत सारे दुर्गुणों को जानकर मुझसे विमुख हो गए हैं अथवा यह सोचते हैं कि मैं किसी स्वार्थवश आपकी शरण में आई हूँ? [2]

आप तो 'दीनबन्धु' (दीनों के सखा) और मन की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाले दाता हैं; फिर आप भला मेरे गुण-अवगुणों को अपने मन में क्यों ला रहे हैं? (आप तो पतितपावन हैं!) 
आप एक हैं जो परम समर्थ उद्धारक हैं परंतु हम जैसे पापी अनेक हैं, क्या इसी विशाल संख्या को देखकर आपका मन संकोच कर रहा है कि कितनों का उद्धार करूँ? [3]

यदि आप हमारी सुध नहीं लेते, तो हम तो गहराई से यही समझेंगें कि आपने संसार में अपना 'दीनबन्धु' नाम झूठा ही रखवाया है। हे मेरे मनमोहन! अब अपनी यह हठ त्याग दीजिए और दासी ‘जुगलप्रिया’ को अपने दिव्य प्रेमामृत का रस-दान दीजिए। [4]