का इन नयननितैं कबहुं निरखूँ रास विलास - श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (08)

का इन नयननितैं कबहुं निरखूँ रास विलास - श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (08)

का इन नयननितैं कबहुं, निरखूँ रास विलास।
का बसि वृन्दावन कबहुँ, पुरवे मेरी आस॥

- श्रीप्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, श्रीवृन्दावन माहात्म्य (08)

हा! क्या इन नेत्रों से मुझे कभी प्रिया-प्रियतम के श्री रास-विलास का दर्शन प्राप्त होगा? क्या कभी ऐसा समय आएगा जब मैं श्री वृन्दावन में अखंड वास करूँगा जिससे मेरे हृदय की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण हो जाएँगी?