मिलि खेलि मोहन सौं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (31)

मिलि खेलि मोहन सौं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (31)

(राग कान्हरौ)
मिलि खेलि मोहन सौं, करि मन-भायौ।
कुंजबिहारी लाल रस-बस बिलसत,
मेरे तन-मन फूल, अपनौ करि पायौ॥ [1]
तुम दिन दुलहिनि, ए दिन दूलहु,
सघन लता गृह-मण्डप छायौ।
कोकिल मधुपगन परैगी भाँवरि तहाँ,
श्रीबीठलविपुल मेघ-मृदंग बजायौ॥ [2]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (31)

श्रीविपुलविहारिनदासी जी अपनी प्राण-प्यारी सखी श्री राधा से कह रही हैं—
हे प्यारीजू! आप अपने मनचाहे चाव और उमंग के साथ श्रीमोहनलाल (श्री कृष्ण) से मिलकर क्रीड़ा कीजिए। जब आप रस में उन्मत्त होकर अपने प्राणप्यारे कुंजबिहारी संग रस-विलास में प्रवृत्त होती हैं केवल तभी हमारे तन-मन-प्राण प्रफुल्लित होते हैं मानो हमारा रोम-रोम सब प्रकार से परितृप्त हो उठता है। [1]

आप नित्य दुलहिनी एवं लालजी नित्य दूलह हैं। श्री वृन्दावन का यह सघन लताओं का कुंज-भवन मानो विवाह का सुंदर मंडप है। कोयल, पक्षीगण और भँवरों के समूह मानो मंगलगीत का गायन कर भाँवर की विधि (विवाह-उत्सव की रस्म) को संपन्न करा रहे हैं और आकाश में छाए बादल गर्जना कर मानो मृदंग ध्वनि से विवाह के आनंद का विवर्धन कर रहे हैं। [2]