जहँ राजत नवल निकुंजन प्यारी।
जहँ पग देत महावर मोहन, जहँ हित बाँधत बैंनि सँभारी ॥ [1]
ललिता ललित विशाखा राजत, सेवा करत सखी सुख भारी।
जहँ की महिमा वेद न जानत, शिव अज रहत विचारी ॥ [2]
जहँ मन-बुद्धि-वचन नहिं पहुँचत, व्यापत नहीं काल माया री।
भाग्य हीन पामर 'भोरी' की, किस विधि होइ तहाँ चरचा री ॥ [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (157)
नित्य-नवीन निकुंजों से सुशोभित रस-धाम श्री वृन्दावन में हमारी प्राणप्यारी श्री राधा सदा सर्वदा नित्य विहार परायण होकर विराज रही हैं। वे दिव्य रूप से सुशोभित हैं; जहाँ स्वयं श्री कृष्ण परम अनुरागवश उनके श्री चरणों में महावर लगाते हैं, और जहाँ अत्यंत लाड़-चाव के साथ उनकी सुंदर वेणी (चोटी) को सँवारकर बाँधते हैं। [1]
जहाँ ललिता-विशाखा आदि सखियाँ दिन-रात तत्सुख भाव से प्रिया-प्रियतम की सेवा में संलग्न रहते हुए परम सुख का अनुभव किया करती हैं, जहाँ की महिमा को जानने के लिये वेद-शास्त्र अनेक प्रयासों के पश्चात् हार-थककर अपने आप को असमर्थ अनुभव करते हैं और शिव जी तथा ब्रह्मा जी भी जिसके गूढ़ रहस्य का निरंतर विचार ही करते रह जाते हैं किंतु उसका पार नहीं पा सकते हैं। [2]
जहाँ पर मन, वाणी एवं बुद्धि का किंचित् भी प्रवेश नहीं है तथा जहाँ पर माया और काल का प्रभाव भी नहीं पड़ता है, उस परम दिव्य धाम में मुझ जैसी भाग्यहीन और परम पामर (अधम) 'भोरी' दासी की चर्चा भला किस प्रकार से हो सकती है (अर्थात् वहाँ का प्रवेश केवल प्रियाजी की अकारण करुणा से ही संभव है)। [3]
जहँ पग देत महावर मोहन, जहँ हित बाँधत बैंनि सँभारी ॥ [1]
ललिता ललित विशाखा राजत, सेवा करत सखी सुख भारी।
जहँ की महिमा वेद न जानत, शिव अज रहत विचारी ॥ [2]
जहँ मन-बुद्धि-वचन नहिं पहुँचत, व्यापत नहीं काल माया री।
भाग्य हीन पामर 'भोरी' की, किस विधि होइ तहाँ चरचा री ॥ [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (157)
नित्य-नवीन निकुंजों से सुशोभित रस-धाम श्री वृन्दावन में हमारी प्राणप्यारी श्री राधा सदा सर्वदा नित्य विहार परायण होकर विराज रही हैं। वे दिव्य रूप से सुशोभित हैं; जहाँ स्वयं श्री कृष्ण परम अनुरागवश उनके श्री चरणों में महावर लगाते हैं, और जहाँ अत्यंत लाड़-चाव के साथ उनकी सुंदर वेणी (चोटी) को सँवारकर बाँधते हैं। [1]
जहाँ ललिता-विशाखा आदि सखियाँ दिन-रात तत्सुख भाव से प्रिया-प्रियतम की सेवा में संलग्न रहते हुए परम सुख का अनुभव किया करती हैं, जहाँ की महिमा को जानने के लिये वेद-शास्त्र अनेक प्रयासों के पश्चात् हार-थककर अपने आप को असमर्थ अनुभव करते हैं और शिव जी तथा ब्रह्मा जी भी जिसके गूढ़ रहस्य का निरंतर विचार ही करते रह जाते हैं किंतु उसका पार नहीं पा सकते हैं। [2]
जहाँ पर मन, वाणी एवं बुद्धि का किंचित् भी प्रवेश नहीं है तथा जहाँ पर माया और काल का प्रभाव भी नहीं पड़ता है, उस परम दिव्य धाम में मुझ जैसी भाग्यहीन और परम पामर (अधम) 'भोरी' दासी की चर्चा भला किस प्रकार से हो सकती है (अर्थात् वहाँ का प्रवेश केवल प्रियाजी की अकारण करुणा से ही संभव है)। [3]

