व्यास वसैं वनखण्डमें, करें निरंतर ध्यान।
तिनकौं हरि कैसें मिलें, भक्तनसौं अभिमान॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (139)
यद्यपि कोई साधक वन में एकांत वास करता हो और निरंतर भगवद्-ध्यान में ही मग्न रहता हो, तथापि यदि उसके अंतःकरण में अन्य भक्तों के प्रति लेशमात्र भी अभिमान है, स्वयं को श्रेष्ठ मानने का अहंकार अथवा किसी अन्य भक्त को लघु समझने एवं उनके प्रति ईर्ष्या-द्वेष विद्यमान है, तो उसे भगवान की प्राप्ति सर्वथा असंभव है; क्योंकि प्रभु केवल निरभिमान और निष्कपट भाव से ही प्रकट होते हैं।
तिनकौं हरि कैसें मिलें, भक्तनसौं अभिमान॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (139)
यद्यपि कोई साधक वन में एकांत वास करता हो और निरंतर भगवद्-ध्यान में ही मग्न रहता हो, तथापि यदि उसके अंतःकरण में अन्य भक्तों के प्रति लेशमात्र भी अभिमान है, स्वयं को श्रेष्ठ मानने का अहंकार अथवा किसी अन्य भक्त को लघु समझने एवं उनके प्रति ईर्ष्या-द्वेष विद्यमान है, तो उसे भगवान की प्राप्ति सर्वथा असंभव है; क्योंकि प्रभु केवल निरभिमान और निष्कपट भाव से ही प्रकट होते हैं।

