मोहन मोपै कही न जाई - श्री दयाबाई

मोहन मोपै कही न जाई - श्री दयाबाई

(सवैया)
मोहन मोपै कही न जाई, दिब्य दृष्टि अति प्यारी।
धसिगई हिरदै माँहि हमारे, निकसत नाहिं निकारी॥ [1]
कहा करौं कित जाऊँ सखी, हरि बिन रह्यौ न जाई।
'दासी दया' चरनपर वारी, आन मिलो सुखदाई॥ [2]

- श्री दयाबाई

एक सखी, अपनी अंतरंग सखी से श्री कृष्ण के रूप-पाश का वर्णन करते हुए कह रही है— 
हे सखी! मोहन की वह अत्यंत प्यारी दिव्य चितवन (दृष्टि) का प्रभाव मुझसे शब्दों में कहा नहीं जाता। उनकी वह चितवन मेरे हृदय के भीतर इस प्रकार गहरे धँस गई है कि अब मेरे बार-बार निकालने का प्रयास करने पर भी वह बाहर नहीं निकलती। [1]

अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ, हे सखी! मेरे से अब उन श्री हरि के बिना क्षण भर भी रहा नहीं जाता! दासी दयाबाई जी कहती हैं कि हे प्राणप्रिय सुखदाता, श्री कृष्ण! मैं आपके श्री चरणों पर बार-बार बलिहारी (न्योछावर) जाती हूँ, कृपा कर अब आकर मुझे शीघ्र मिलिए। [2]