कथय कथय जिह्वे सद्‌गुणान् - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (07)

कथय कथय जिह्वे सद्‌गुणान् - श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (07)

कथय कथय जिह्वे सद्‌गुणान् भूधरस्य विमृश विमृश चेतस्त्वद्भुतं तत्त्वरूपम्।
पिव पिव वत चक्षु स्तच्छ्रियं वीक्षणेन विलुठ विलुठ मार्गे त्वं तनो, नित्त्यमेव॥

- श्री केशवाचार्य, गोवर्द्धन शतक (07)

हे जिह्वा! तू श्री गिरिराज गोवर्धन के श्रेष्ठ गुणों का निरंतर वर्णन कर। हे मन! तू उनके अद्भुत स्वरूप का बार-बार ध्यान कर। हे नेत्र! तू उनकी मनोरम शोभा का दर्शन करके उसका रसपान कर, और हे मेरे शरीर! तू नित्य ही श्री गोवर्द्धन के मार्ग की पावन धूलि में प्रेमपूर्वक लुण्ठन (लोट-पोट) किया कर।