(राग बिहागरौ)
हरि-मुख राधा-राधा बानी।
धरिनी परे अचेत नहीं सुधि, सखी देखि अकुलानी॥ [1]
बासर गयौ, रैनि इक बीती, बिनु भोजन बिनु पानी।
बाहँ पकरि तब सखिनि जगायौ, धनि-धनि सारँग पानी॥ [2]
ह्याँ तुम बिबस गए हौ ऐसे, ह्वाँ तौ वै बिबसानी।
‘सूर’ बने दोउ नारि पुरुष तुम, दुहुँ की अकथ कहानी॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर (3377)
श्री हरि के मुख से निरंतर केवल 'राधा-राधा' का ही नाम निकल रहा है। वे सुध-बुध खोकर अचेत अवस्था में पृथ्वी पर पड़े हुए हैं, उनकी ऐसी दशा देखकर सखियाँ अत्यंत व्याकुल हो उठी हैं। [1]
इसी विरह-मूर्च्छा में पूरा दिन बीत गया और एक रात भी व्यतीत हो गई, परंतु उन्होंने न तो भोजन ग्रहण किया और न ही जल की एक बूँद पी। तब सखियों ने व्याकुल होकर उनकी बाँह पकड़कर उन्हें जगाया और कहने लगीं— हे धनुषधारी (सारँग पानी) श्री कृष्ण! आपका श्री राधा के प्रति यह अद्भुत प्रेम धन्य है, आपकी यह अनन्य निष्ठा धन्य है! [2]
हे श्यामसुंदर! यहाँ आपकी विरह में ऐसी दशा हो गई है, और वहाँ आपके वियोग में वे किशोरी जी (श्री राधा) भी इसी प्रकार पूर्णतः विवश हो रही हैं। श्री सूरदास जी कहते हैं कि तुम दोनों साक्षात प्रेम की पराकाष्ठा के सर्वोत्तम प्रेमी-प्रेमिका हो, आप दोनों युगल की यह प्रेम-कहानी वास्तव में अकथनीय (वाणी से परे) है। [3]
हरि-मुख राधा-राधा बानी।
धरिनी परे अचेत नहीं सुधि, सखी देखि अकुलानी॥ [1]
बासर गयौ, रैनि इक बीती, बिनु भोजन बिनु पानी।
बाहँ पकरि तब सखिनि जगायौ, धनि-धनि सारँग पानी॥ [2]
ह्याँ तुम बिबस गए हौ ऐसे, ह्वाँ तौ वै बिबसानी।
‘सूर’ बने दोउ नारि पुरुष तुम, दुहुँ की अकथ कहानी॥ [3]
- श्री सूरदास, सूरसागर (3377)
श्री हरि के मुख से निरंतर केवल 'राधा-राधा' का ही नाम निकल रहा है। वे सुध-बुध खोकर अचेत अवस्था में पृथ्वी पर पड़े हुए हैं, उनकी ऐसी दशा देखकर सखियाँ अत्यंत व्याकुल हो उठी हैं। [1]
इसी विरह-मूर्च्छा में पूरा दिन बीत गया और एक रात भी व्यतीत हो गई, परंतु उन्होंने न तो भोजन ग्रहण किया और न ही जल की एक बूँद पी। तब सखियों ने व्याकुल होकर उनकी बाँह पकड़कर उन्हें जगाया और कहने लगीं— हे धनुषधारी (सारँग पानी) श्री कृष्ण! आपका श्री राधा के प्रति यह अद्भुत प्रेम धन्य है, आपकी यह अनन्य निष्ठा धन्य है! [2]
हे श्यामसुंदर! यहाँ आपकी विरह में ऐसी दशा हो गई है, और वहाँ आपके वियोग में वे किशोरी जी (श्री राधा) भी इसी प्रकार पूर्णतः विवश हो रही हैं। श्री सूरदास जी कहते हैं कि तुम दोनों साक्षात प्रेम की पराकाष्ठा के सर्वोत्तम प्रेमी-प्रेमिका हो, आप दोनों युगल की यह प्रेम-कहानी वास्तव में अकथनीय (वाणी से परे) है। [3]

