रंचक दोष ना देखिये - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (31)

रंचक दोष ना देखिये - गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (31)

रंचक दोष ना देखिये, वे गुन प्रेम अमोल।
प्रेम सुहागी जो मिले, तासों अंतर खोल॥

- गोस्वामी श्री हरिराय जी, वल्लभ साखी (31)

प्रभु के विशुद्ध प्रेमी रसिक भक्त में भूलकर भी कभी रंचमात्र भी दोष-दर्शन नहीं करना चाहिए। उनके लौकिक अथवा बाह्य आचरण को न देखकर केवल उनके भीतर का वह अनमोल प्रेम-धन रूपी दिव्य गुण को ही निहारना चाहिए। इस संसार में सर्वप्रथम तो ऐसे प्रेमी संत का मिलना ही अत्यंत सुदुर्लभ है; किन्तु यदि भगवद्-कृपा और परम सौभाग्य से कभी कहीं वे मिल जायें, तो उनके सम्मुख अपने हृदय के समस्त कपाट (भाव) खोलकर स्वयं को समर्पित कर देना चाहिए।