हेलीरी तैं लखे आजु के ख्याल - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (34)

हेलीरी तैं लखे आजु के ख्याल - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (34)

(सवैया)
हेलीरी तैं लखे आजु के ख्याल बखान कहाँ लौं करै मति मोरी।
राधे के सीस पै मोर पखा मुरली लकुटी कटि में पट डोरी॥ [1]
बेंदी बिराजत लाल के भाल में चूनरी रंग कुसुंभ में बोरी ।
मान कै मोहन बैठि रहे सो मनावत श्रीवृषभान किसोरी॥ [2]

- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (34)

एक सखी दूसरी सखी से निकुंज में हुए विपरीत-विहार का अत्यंत रसमय वर्णन कर रही है—
हे सखी! क्या तूने आज प्रिया-प्रियतम के उस अनूठे और कौतुकभरे विलास को देखा? मेरी बुद्धि इतनी सामर्थ्यवान नहीं कि मैं उसका पूरी तरह से बखान कर सकूँ। आज हमारी प्यारी श्री राधा जी के शीश पर मोरपंख सुशोभित है, और उनके हाथों में वंशी तथा लकुटी (लाठी) है, एवं उनकी कमर में पीताम्बर की डोरी बंधी हुई है (अर्थात् श्री राधा ने श्री कृष्ण का भेष धारण किया है)। [1] 

और उधर प्रियतम लाल जी (श्री कृष्ण) के मस्तक पर सुंदर बिंदिया सुशोभित है, और वे कुसुम्भी (लाल-गुलाबी) रंग की चुनरी ओढ़े हुए हैं (अर्थात् श्री कृष्ण ने राधा जी का भेष धारण किया है)। इस अद्भुत लीला में मोहन आज मान (रूठकर) करके बैठ गए हैं, और वृषभानु की लाडली श्री राधा (जो कृष्ण रूप में हैं) उन्हें अत्यंत लाड से मना रही हैं। [2]