श्रम जल कन नाहीं होत - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (59)

श्रम जल कन नाहीं होत - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (59)

(राग कान्हरौ)
श्रम जल कन नाहीं होत मोती माला कौ देहु।
देखे बहुत अमोल मोल नहीं
तन मन धन न्यौछावर लेहु॥ [1]
रति बिपरीत प्रीति कौ आलस
नाहीं नायक तेरे मधि एहु।
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी
प्रीति बर मिलए बेहु॥ [2]

- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (27)

हे राधे! सुरत-श्रम के पश्चात तुम्हारी रसमयी छवि के श्रीअंगों पर सुशोभित ये स्वेद-बिन्दु (पसीने की बूँदें) कोई साधारण जल-कण नहीं हैं, अपितु ये साक्षात् चिन्मय मोतियों की माला के समान दमक रहे हैं। संसार में अनेक बहुमूल्य मोती तो देखे, किन्तु  इस अलौकिक छवि का कोई मूल्य नहीं है; इस अद्भुत रूप-माधुरी पर मैं अपना तन, मन और धन सब कुछ बार-बार न्योछावर करता हूँ। [1]

हे रसिक नायक! इस विपरीत-विहार के जनित श्रम से प्रकट हुआ यह परम सुखद रस आप दोनों के मध्य दिव्य प्रीति को प्रकट कर रहा है। स्वामी श्री हरिदास जी कहते हैं कि मेरे सर्वस्व तो युगल-सरकार स्यामा-कुंजबिहारी ही हैं, जो दिव्य प्रेम के वशीभूत होकर, इस अगाध विहार-रस में परस्पर पूर्णतः एकाकार होकर मिल गए हैं। [2]