रहःकेलिसुखस्थाने सखीप्रेमकरेऽनघे।
कृष्णोत्कर्षकरे नित्यं राधिके त्वं प्रसीद मे॥
- सनत्कुमार संहिता, श्रीराधास्तोत्रं (2)
जो एकान्तिक निकुञ्ज-केली-लीलाओं के सुख का मूल (आश्रय) हैं तथा सखियों के प्रेम को बढ़ाने वाली हैं, जो निष्पाप हैं, जो सदा श्रीकृष्ण के आनन्द एवं महिमा को बढ़ाने वाली हैं, ऐसी श्री राधिके! मुझ पर प्रसन्न हों।
कृष्णोत्कर्षकरे नित्यं राधिके त्वं प्रसीद मे॥
- सनत्कुमार संहिता, श्रीराधास्तोत्रं (2)
जो एकान्तिक निकुञ्ज-केली-लीलाओं के सुख का मूल (आश्रय) हैं तथा सखियों के प्रेम को बढ़ाने वाली हैं, जो निष्पाप हैं, जो सदा श्रीकृष्ण के आनन्द एवं महिमा को बढ़ाने वाली हैं, ऐसी श्री राधिके! मुझ पर प्रसन्न हों।

