पंडित पढि पढि पचि मरे - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (321)

पंडित पढि पढि पचि मरे - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (321)

पंडित पढि पढि पचि मरे, पढ्यौ न अछिर एक।
बोझ धरै सिर बादि हीं, उपज्यौ नहीं विवेक॥

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (321)

न जाने कितने पंडित बड़ी-बड़ी पोथियाँ पढ़ते-पढ़ते जीवन भर उसी में उलझे रहे और अंततः अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ गँवा बैठे, परंतु वे प्रेम का एक भी वास्तविक अक्षर न पढ़ सके। वे केवल शुष्क शास्त्रीय ज्ञान का निरर्थक बोझ अपने सिर पर ढोते रहे, जिसके कारण उनके भीतर सच्चे विवेक का उदय न हो सका।