(राग देवगंधार)
कुँवरि मोहे देहु बास बरसाने।
विपरीतन तन तजि भजि आपुन यों, राजो महल रबाने॥ [1]
दरस परस नित कुँवर किशोरी, ललित सखी गुन गाने।
परम उदार चतुर स्वामिन बिन, श्री बंसी अलि को जाने॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (25)
हे वात्सल्यमयी लाड़ली किशोरी जी! आप अकारण करुणा करके मुझे अपने परम पावन और रसमय धाम श्री बरसाना में सदा के लिए अखंड वास प्रदान कर दीजिये। इस संसार के नश्वर और भजन-प्रतिकूल समस्त भौतिक वासनाओं का सर्वथा परित्याग करके, मैं केवल आपके भजन में लीन रहूँ और आपके दिव्य महल में सदा अनुरागपूर्वक निवास करता रहूँ। [1]
जहाँ मुझे प्रतिदिन आपके दिव्य दर्शन और परम पावन चरण-स्पर्श का सौभाग्य प्राप्त होता रहे, और मैं सदा श्री ललिता जू के दिव्य सान्निध्य में रहकर अनन्य भाव से आपका ही गुणगान किया करूँ। श्री वंशी अलि भाव-विह्वल होकर कहते हैं कि मेरी सुजान स्वामिनी श्री राधा के समान उदार और निपुण भला इस सम्पूर्ण त्रिलोकी में और कौन हो सकता है! उनके अतिरिक्त मैं संसार में किसी अन्य को जानता भी नहीं हूँ। [2]
कुँवरि मोहे देहु बास बरसाने।
विपरीतन तन तजि भजि आपुन यों, राजो महल रबाने॥ [1]
दरस परस नित कुँवर किशोरी, ललित सखी गुन गाने।
परम उदार चतुर स्वामिन बिन, श्री बंसी अलि को जाने॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (25)
हे वात्सल्यमयी लाड़ली किशोरी जी! आप अकारण करुणा करके मुझे अपने परम पावन और रसमय धाम श्री बरसाना में सदा के लिए अखंड वास प्रदान कर दीजिये। इस संसार के नश्वर और भजन-प्रतिकूल समस्त भौतिक वासनाओं का सर्वथा परित्याग करके, मैं केवल आपके भजन में लीन रहूँ और आपके दिव्य महल में सदा अनुरागपूर्वक निवास करता रहूँ। [1]
जहाँ मुझे प्रतिदिन आपके दिव्य दर्शन और परम पावन चरण-स्पर्श का सौभाग्य प्राप्त होता रहे, और मैं सदा श्री ललिता जू के दिव्य सान्निध्य में रहकर अनन्य भाव से आपका ही गुणगान किया करूँ। श्री वंशी अलि भाव-विह्वल होकर कहते हैं कि मेरी सुजान स्वामिनी श्री राधा के समान उदार और निपुण भला इस सम्पूर्ण त्रिलोकी में और कौन हो सकता है! उनके अतिरिक्त मैं संसार में किसी अन्य को जानता भी नहीं हूँ। [2]

