(राग-ललित व भैरव)
जय जय जमुना सब सुखकारी।
अति कृपाल करुणा की मूरति, मंगल करन अमंगल हारी॥ [1]
प्रेम परा भक्ति रस दाता, जुगलचन्द की परम पियारी।
“रूपमाधुरी” कुञ्ज केलि रस, दरसावहुँ मैं शरण तुम्हारी॥ [2]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (141)
सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं। [1]
आप परम दुर्लभ दिव्य प्रेम और परा-भक्ति का रस प्रदान करने वाली हैं, तथा रसमय युगलचन्द (श्री राधा-श्यामसुंदर) की अत्यंत प्यारी हैं। श्री रूप माधुरी प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे श्री यमुना जी! मैं आपकी शरण में आया हूँ, कृपा करके मुझे निकुंज भवन के उस परम गोपनीय दिव्य केलि रस का दर्शन कराइए। [2]
जय जय जमुना सब सुखकारी।
अति कृपाल करुणा की मूरति, मंगल करन अमंगल हारी॥ [1]
प्रेम परा भक्ति रस दाता, जुगलचन्द की परम पियारी।
“रूपमाधुरी” कुञ्ज केलि रस, दरसावहुँ मैं शरण तुम्हारी॥ [2]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (141)
सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली श्री यमुना जी की बारंबार जय हो, जय हो। आप भक्तों पर अत्यंत कृपा करने वाली और साक्षात् करुणा की मूर्ति हैं। आप सदा सबका मंगल (कल्याण) करने वाली और समस्त अमंगलों (दुखों व संकटों) को हरने वाली हैं। [1]
आप परम दुर्लभ दिव्य प्रेम और परा-भक्ति का रस प्रदान करने वाली हैं, तथा रसमय युगलचन्द (श्री राधा-श्यामसुंदर) की अत्यंत प्यारी हैं। श्री रूप माधुरी प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे श्री यमुना जी! मैं आपकी शरण में आया हूँ, कृपा करके मुझे निकुंज भवन के उस परम गोपनीय दिव्य केलि रस का दर्शन कराइए। [2]

