(राग कान्हरौ)
एक प्रीति बस जिनि किये मोहन,
याही तें ब्रज-रीति नियारी। [1]
जाकी माया जगत नचायौ,
ताहि नचावत घोष की नारी॥ [2]
जाकी चरन-रज ब्रह्मादिक दुर्लभ,
सो रज ब्रज-बधू बगर बुहारी। [3]
'सूरदास मदनमोहन' जिनके हरि नैन-प्रान,
कहा कहूँ बुद्धि अनुसारी॥ [4]
- श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत), सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (03)
एकमात्र विशुद्ध प्रेम के वश में होकर जिन ब्रजांगनाओं ने मनमोहन श्री कृष्ण को पूरी तरह अपने अधीन कर लिया है, इसी कारण इस ब्रज की प्रेम-रीति संपूर्ण ब्रह्मांड से अत्यंत विशिष्ट और निराली है। [1]
जिन भगवान की त्रिगुणात्मक माया ने संपूर्ण संसार के चराचर जीवों को अपने इशारे पर नचाया है, उन साक्षात् सर्वेश्वर को ब्रज की अहीर-नारियाँ (गोपिकाएँ) अपने प्रेम के बल पर छछिया भर छाछ के लिए उँगलियों पर नचाती हैं। [2]
जिन भगवान की दिव्य चरण-रज को प्राप्त करना ब्रह्मा, शंकर और सनकादिक ऋषियों के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है, उसी पावन रज को ब्रज की बहुएँ अपने घर के आँगन (बगर) और रास्तों में झाड़ू से बुहारती हैं। [3]
श्री सूरदास मदनमोहन कहते हैं कि जिन ब्रजांगनाओं के नेत्रों के तारे और प्राणों के आधार साक्षात् श्री हरि ही हैं, उनके उस अलौकिक प्रेम का वर्णन मैं अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार और कहाँ तक करूँ; वह वाणी और बुद्धि से सर्वथा परे है। [4]
एक प्रीति बस जिनि किये मोहन,
याही तें ब्रज-रीति नियारी। [1]
जाकी माया जगत नचायौ,
ताहि नचावत घोष की नारी॥ [2]
जाकी चरन-रज ब्रह्मादिक दुर्लभ,
सो रज ब्रज-बधू बगर बुहारी। [3]
'सूरदास मदनमोहन' जिनके हरि नैन-प्रान,
कहा कहूँ बुद्धि अनुसारी॥ [4]
- श्री सूरदास मदनमोहन (गौड़ीय संत), सूरदास मदनमोहन जी की पदावली (03)
एकमात्र विशुद्ध प्रेम के वश में होकर जिन ब्रजांगनाओं ने मनमोहन श्री कृष्ण को पूरी तरह अपने अधीन कर लिया है, इसी कारण इस ब्रज की प्रेम-रीति संपूर्ण ब्रह्मांड से अत्यंत विशिष्ट और निराली है। [1]
जिन भगवान की त्रिगुणात्मक माया ने संपूर्ण संसार के चराचर जीवों को अपने इशारे पर नचाया है, उन साक्षात् सर्वेश्वर को ब्रज की अहीर-नारियाँ (गोपिकाएँ) अपने प्रेम के बल पर छछिया भर छाछ के लिए उँगलियों पर नचाती हैं। [2]
जिन भगवान की दिव्य चरण-रज को प्राप्त करना ब्रह्मा, शंकर और सनकादिक ऋषियों के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है, उसी पावन रज को ब्रज की बहुएँ अपने घर के आँगन (बगर) और रास्तों में झाड़ू से बुहारती हैं। [3]
श्री सूरदास मदनमोहन कहते हैं कि जिन ब्रजांगनाओं के नेत्रों के तारे और प्राणों के आधार साक्षात् श्री हरि ही हैं, उनके उस अलौकिक प्रेम का वर्णन मैं अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार और कहाँ तक करूँ; वह वाणी और बुद्धि से सर्वथा परे है। [4]

