पायौ है नर-तन कछु आगे कौ जतन करि - ब्रज के कवित्त

पायौ है नर-तन कछु आगे कौ जतन करि - ब्रज के कवित्त

(कवित्त)
पायौ है नर-तन कछु आगे कौ जतन करि,
संग सतसंग सों अमीं रस पाइलै। [1]
पाइलै प्रसाद हरि भक्तन कौ बार-बार,
पूरबले पापन को मन सों हटाइलै॥ [2]
हटाइलै कपट के परदा सब ऊपर सों,
भक्ति-सरिता में भरि गोता लगाइले। [3]
लगाइलै प्रीति सांची धेनु-बिप्र-साधुन सों,
'राम' भय-हारी तू बिहारी-नाम गाइलै॥ [4]

- ब्रज के कवित्त

हे मनुष्य! तुम्हें यह दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है, इसलिए अपने परम कल्याण का प्रयत्न करो। संतों की संगति करके भक्ति-रस रूपी अमृत का पान करो। [1]

बार-बार हरि-भक्तों की कृपा और प्रसाद प्राप्त करो तथा अपने पूर्व संचित पापों को मन से भस्म करो। [2]

अपने ऊपर पड़े हुए कपट और दम्भ के समस्त आवरणों को हटाकर भक्ति-सरिता में पूर्ण रूप से डुबकी लगाओ। [3]

गौ, ब्राह्मण और साधुजनों के प्रति सच्चा प्रेम स्थापित करो तथा हे जीव! समस्त भय का नाश करने वाले श्री बांके बिहारी जी के नाम का निरन्तर गान करो। [4]