वौरी ह्वै मग डोलिये, श्रीवृन्दावन धाम।
कुउ कछु बूझै ये भटू, कहिये श्यामाश्याम॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (246.14)
हे सजनी! तुम लोक-लाज का सर्वथा त्याग करके श्रीधाम वृन्दावन की कुंज-गलियों में केवल श्यामा-श्याम के प्रेम में विह्वल (बौरी) होकर विचरण करो। हे भटू (सखी)! यदि मार्ग में कोई तुमसे कुछ पूछे भी, तो उसके उत्तर में अपनी रसना से केवल 'श्यामाश्याम' का ही उच्चारण करो, इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी चर्चा में न पड़कर सर्वथा मौन धारण कर लो।
कुउ कछु बूझै ये भटू, कहिये श्यामाश्याम॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (246.14)
हे सजनी! तुम लोक-लाज का सर्वथा त्याग करके श्रीधाम वृन्दावन की कुंज-गलियों में केवल श्यामा-श्याम के प्रेम में विह्वल (बौरी) होकर विचरण करो। हे भटू (सखी)! यदि मार्ग में कोई तुमसे कुछ पूछे भी, तो उसके उत्तर में अपनी रसना से केवल 'श्यामाश्याम' का ही उच्चारण करो, इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी चर्चा में न पड़कर सर्वथा मौन धारण कर लो।

