वेद थके कहि तत्र थके - श्री सुंदरदास जी

वेद थके कहि तत्र थके - श्री सुंदरदास जी

(सवैया)
वेद थके कहि तत्र थके कहि ग्रन्थ थके निशि बासर गातें।
शेष थके शिव इन्द्र थके पुनि खोज कियो बहु भांति बिथा तें॥ [1]
पीर थके अरु मीर थके पुनि धीर थके बहु बोलि गिरा तें।
सुन्दर मौन गही सिध साधक कौन कहै उसकी मुख बातें॥ [2]

- श्री सुंदरदास जी

उस परम तत्व, भगवान (श्री कृष्ण) की महिमा का वर्णन करते-करते वेद थक गए, तत्त्ववेत्ता थक गए और ग्रन्थ भी दिन-रात उसका गुणगान करते-करते थक गए। शेष, शिव और इन्द्र जैसे देवता भी उसकी खोज अनेक प्रकार से करते रहे, परन्तु उसकी पूर्ण सीमा नहीं पा सके। [1]

पीर-पैगंबर, मीर और बड़े-बड़े धीर-गम्भीर ज्ञानी भी सब केवल उसके विषय में बहुत कुछ कहकर थक गए। अन्ततः सुन्दरदास जी कहते हैं कि सिद्ध और साधक सभी मौन धारण कर लेते हैं, क्योंकि उसकी महिमा का यथार्थ वर्णन कौन कर सकता है? [2]