नवल दोउ आजु बसंत-से फूले - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.3)

नवल दोउ आजु बसंत-से फूले - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.3)

(राग बसन्त)
नवल दोउ आजु बसंत-से फूले।
गोरी किसोरी के अंस दिये भुज, स्याम छिपे भुज मूले॥ [1]
सहज सिंगार अनंग के अंगनि, सोहत पीत दुकूले।
रंग में रंग बढ़ावति लाड़िली लाल हिंडोरे-से झूले॥ [2]
यह सुख नित्य दिखावत नागरी, नाहु भये अनुकूले।
भगवत रसिक बिलोकत यह छबि, नैन कुरंग से भूले॥ [3]

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.3)

आज दोनों नित्य किशोर (श्री राधा-कृष्ण) वसंत ऋतु के समान खिले हुए हैं। गोरी किशोरी जी द्वारा श्यामसुन्दर के कंधे (अंस) पर अपनी भुजा डाल दिये जाने से, श्यामसुंदर उनकी भुज-मूल (बाँहों के आश्रय) में छिपे हुए से सुशोभित हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो श्याम घटा छिप गई हो और गोरे वर्ण की वासन्ती सुषमा छा गई हो। [1]

इस समय दोनों की सम्मिलित शोभा को देखकर ऐसा लग रहा है, जैसे कामदेव अपने अंग-अंग में स्वर्णाभूषणों का सहज शृंगार किये तथा पीताम्बर पहिने शोभित हो रहा हो। (यहाँ पीताम्बर श्री राधा को दर्शाया गया है मानो वे कामदेव रूपी कृष्ण के अंगों से पीताम्बर की भाँति लिपटी हैं)। इस स्थिति में प्रिया-लाल जब हिंडोले-से झूलने लगते हैं, तब तो इस वासन्ती शोभा का रंग और भी आनन्द वर्धक हो जाता है। [2]

भगवतरसिक जी कहते हैं कि नित्य दंपति श्री श्यामा कुंजबिहारी सदा हमारे अनुकूल रहते हैं तथा नित्य ही हमें इस विहार लीला के दर्शन करवा कर रसपान करवाते रहते हैं, जिनका दर्शन करके हमारे हिरण समान नेत्र सदा इस नित्य विहार से मोहित हुए रहते हैं। [3]