परसत ही ह्वै विबस पिय - ब्रज के दोहे

परसत ही ह्वै विबस पिय - ब्रज के दोहे

परसत ही ह्वै विबस पिय, राधे तन सुकुमार।
सुघरराय कहियत तऊ, कर नहिं सकत सिंगार॥

- ब्रज के दोहे

श्री राधा के श्रीअंग इतने सुकोमल हैं जिनके केवल स्पर्श मात्र से प्रियतम श्री कृष्ण विवश (प्रेम में मूर्छित अथवा भाव-विह्वल) हो जाते हैं। इसी कारण प्रियतम परम चतुर होने पर भी, प्रेम के आवेग में स्वयं को सम्भाल नहीं पाते और चाहकर भी उनका श्रृंगार नहीं कर पाते।