मन की गति तौं तुम - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी

मन की गति तौं तुम - श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी

(सवैया)
मन की गति तौं तुम जानत हौ, तनसौं नहिं काज कछु बनि आइबौं।
जानत नाहिं धौं कौन कृपा बल, श्री हरिवंश कौ पंथ मिलाइबौ॥ [1]
कैसे कहाँ जु दयालुता राबरी, जैसे अनुग्रह सौ हित छाइबौ।
ऐसी करौ सतसंग के रंग में, श्रीवन-वास निरन्तर पाइबौ॥ [2]

- श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी

हे स्वामिनी जी! मेरे हृदय की वास्तविक दशा तो आप भली-भाँति जानती ही हैं; इस शरीर के बल से तो मुझसे कोई तप या आध्यात्मिक साधन सफल नहीं हो सकता। मैं नहीं जानता कि आपके किस अपार कृपा-बल से मुझे रसोपासना के परम आचार्य श्री हरिवंश महाप्रभु का यह पावन मार्ग प्राप्त हुआ है। [1]

मैं आपकी उस दयालुता का वर्णन भला कैसे और क्या करूँ, जिसकी कृपा प्रसाद से मैं प्रेम मार्ग से आपको लाड़ लड़ा रहा हूँ। अतः हे राधा महारानी! अब मुझ पर बस ऐसी कृपा ही कृपा बनायें कि मैं सत्संग के रंग में सदा रंगा रहूँ और श्री वृन्दावन का अखंड वास करूँ। [2]