या रस कों हौं हीं - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (796)

या रस कों हौं हीं - श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (796)

(राग सारंग - चौताल)
या रस कों हौं हीं बखानौं ऐसें ।
बृंदावन जमुना-तट बिहरत, राधा-मोहन जैसें॥ [1]
छिनहीं छिन या सरस सवादै, लेत देत समझत तेई तैसें ।
आनंदघन याकी घमँडनि कों, उघरि लखै कोऊ कैसें॥ [2]

- श्री आनन्दघन जी, घनानंद ग्रंथावली, पदावली (796)

श्री प्रिया-प्रियतम के अत्यंत गोपनीय और अनिर्वचनीय निकुंज-रस का गान करते हुए रसिक शिरोमणि कवि आनंदघन जी कह रहे हैं—

इस परम अलौकिक और गूढ़ प्रेम-रस का बखान भला मैं अपनी तुच्छ वाणी से किस प्रकार कर सकता हूँ? परम पावन श्रीधाम श्रीवृंदावन में, यमुना जी के सुंदर तट पर श्रीराधा-मोहन जिस अंतरंग भाव से नित्य विहार करते हैं, वह वाणी से सर्वथा परे है। [1]

उस रस के परम सरस आस्वादन को वे दोनों ही परस्पर ग्रहण करते हैं, उस रस-रीति को साक्षात् रूप से वे ही समझते हैं। आनंद के मेघ (आनँदघन) रूप प्रिया-प्रियतम के इस रस की उमड़ती हुई परम सघन घटाओं की अनुभूति को कोई भी संसारी जीव प्रकट रूप से भला कैसे देख और अनुभव कर सकता है, क्योंकि यह तो केवल अनन्य रसिकों का ही धन है। [2]