येयं राधा यश्च कृष्णो - अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (12)

येयं राधा यश्च कृष्णो - अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (12)

येयं राधा यश्च कृष्णो रसाब्धिदेहश्चैकः क्रीडनार्थं द्विधाऽभूत्।
देहोयथा छायया शोभमानः शृण्वन् पठन् याति तद्धाम् शुद्धम्॥

- अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (12)

श्रीराधा और श्रीकृष्ण वास्तव में एक ही प्रेम-रस-सागर स्वरूप तत्त्व हैं। केवल अपनी लीलाओं के विस्तार हेतु वे दो रूपों में प्रकट हुए हैं। जैसे छाया से देह की शोभा बढ़ती है, उसी प्रकार श्रीराधा से श्रीकृष्ण शोभायमान होते हैं और दोनों कभी एक-दूसरे से पृथक नहीं होते। इनके दिव्य चरित्रों का श्रवण एवं पठन करने से जीव उनके उस परम निर्मल एवं दिव्य धाम को प्राप्त करता है।